ईश्वर के कई चहेरे मेरी फोटो फ्रेम में – #Hindi #Poem


I have written this poem in English, Hindi and Gujarati and am posting in all three languages. Each time the words are slightly altered.

मेरी पड़ोस में रहती हुई महिला रोज बहार आकर अपने घर के पास उगते हुए सुंदर गुलाब और अन्य फूलों को काटकर अपनी पूजा की थाली में इकट्ठा करके घर ले जाती है। इस दृश्य को बार बार देखने के बाद  यह काव्य लिखा है 

मुझे नहीं पता हे ईश्वर आपकी क्या मर्जी है
आपको भजति हु जैसी मेरी समज होती है  

आप के ही सर्जन के सुंदर फूल चुनकर  
अपने  मातापिता सामान पौधों से अलग कर 

प्रस्तुत करती हूँ आप ही की सुन्दर छबि के सामने 
आपके कई चहेरे मैंने फोटो फ्रेम में उतारे है 

कभी सोचा आप को, डरावने माँ काली के रूप में
कभी अनुरागशील गणेशजी और कभी मां दुर्गा के स्वरूप में

कभी बुद्ध और महावीर के तटस्थ चेहरे में पाया 
कभी बिन चहेरे आपको मस्जिद में मेने पाया 

मेरे ठहराए गए रस्मो कस्मो से आपको बांध लिया  
कभी फल खाकर कभी रोजा रखकर आपको प्रसन्न किया  

कभी इशू के क्रॉस पर लहू में आपकी दया को देखकर
कभी कृष्ण की बांसुरी की ध्वनिमें आपकी भक्ति में रंगकर 

खोजने आपको मंदिर मस्जिद चर्च और कहाँ कहाँ भटकी  
अलग अलग नियमो और रस्मो से में परेशान हुई 

मैंने अपनी कल्पना से तुम्हारे कई चेहरे गढ़े हैं
पर भूल जाती हु वोही चेहरा जो मेरे सामने है

Various dance poses of an Indian Male Peacock stock photo

मोर की कला, तेंदुए की दौडान, मेंढक की छलांग
सिंह का गुर्राना कोयल के टहूके, पंखी का कलरव 

कोयल के टहूकने में, भमरे के भनभनानेमें, 
आप को पा लू में फुलोके खिलने और मुर्झानेमे  

मैं छवि में आपका चेहरा क्यों बनाऊ 
रस्मो रिवाजमे क्यों हैरान हो जाऊ 

अलौकिक, आपकी यह रचना अमृतमयी
मान क्यों न लें कि यही आपकी पुष्टि आपकी छवि

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  1. #1 by dilipsaraf2017 on October 17, 2021 - 3:20 am

    Thanks, Darshana, for sharing this beautiful poem and your poetic talent!

    Dilip Saraf (San-Francisco, CA) Time zone is local (PT) if not specified. (510-791-7005); 510-331-9317M http://dilipsaraf.com (LinkedIn’s Top Coach) https://www.linkedin.com/in/topcoach

    On Sat, Oct 16, 2021 at 10:02 PM Darshana Varia Nadkarni’s Blog wrote:

    > Darshana V. Nadkarni, Ph.D. posted: ” I have written this poem in English, > Hindi and Gujarati and am posting in all three languages. Each time the > words are slightly altered. मेरी पड़ोस में रहती हुई महिला रोज बहार आकर अपने > घर के पास उगते हुए सुंदर गुलाब और अन्य फूलों को काटकर अपनी पूजा की” >

  2. #2 by sapana53 on October 24, 2021 - 4:39 pm

    nice poem God has no face !

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