डिम्पल पटेल द्वारा आयोजित गीत और ग़ज़ल का प्रोग्राम – “दिल से” – “Dil Se” Music Program by Dimple Patel


डिम्पल पटेल द्वारा आयोजित गीत और ग़ज़ल का प्रोग्राम – “दिल से”

दिम्प्ल्भाई और उनके साथियोने सुरीली शाम को, दिल से, ग़ज़ल और गीत सुनाके खुबसूरत सुर में समेट ली. निलेश भाई धोमसे ने कीबोर्ड पर, सुरजीत भाई बावा ने तबला पर और जेम्स भाई प्रसाद ने गिटार पर उनका साथ दिया.

डिम्पल भाई ने पंकज उधासजी का “तेरी निगाह से ऐसी शराब पी मैंने” से शुरुआत की तब प्रेक्षकों भी इस शाम को, होश का दावा छोड़कर, गीत और ग़ज़ल की धून में ज़ूम उठे. जब उन्होंने, मेरी फेवरेट, अनुपजी की गाई हुई “मरने के बाद भी मेरी आँखे खुली रही” ग़ज़ल दोहराई तब आदत पड गयी मुझे भी ऐसे  गाने के इन्तेजार की. हेतलबहेंन भ्रमभट ने फिल्म आब्षर-ए-ग़ज़ल का गाना “सलोना  साजन है और में हूँ” गाकर दिल खुश कर दिया. फिर दिम्प्ल्भाई ने फिल्म निकाह की, गुलाम अली द्वारा गाई हुई, मेरी एमदम फेवरेट ग़ज़ल, “चुपके चुपके आंसू बहाना” गाकर बीते हुए दिनोकी याद दीला दी.

आनलबहेन अन्जारिया ने सुरीली आवाज में “सात सुरोंका बहेता दरिया” गाकर शाम प्रेक्षकों के नाम कर दी तो निकुंज भाई वैद्य ने “होंशवालों को खबर क्या है” गाकर प्रेक्षकों के होंश उडा दिए और जया बहन सतीश ने “यारा सिली सिली” गाया और ऑडिटोरियम में मस्ती छा गयी. दिम्प्ल्भाई बे एरिया के बहेतरीन कलाकार है और १६५ से ज्यादा म्यूजिक प्रोग्राम कर चुके हे. डिम्पलभाई ने सुनाया “हम तो है परदेश” और “ये दौलत भी ले लो”. हेतलबहेन ने सुनाई उमराव जान की ग़ज़ल “दिल चीज क्या है” और उनका हर कहा मानने को दिल तैयार हो गया.

ढोकला और चाय का नाश्ता की मजा लेकर प्रेक्शकोने “चाँदी जैसा रंग हे तेरा” गाने की मजा ली और फिर आनलबहेन ने फिल्म आनंद महल का येसुदासजी का गया हुआ गाना “आ आ रे मितवा” दोहराया. आनल बहेन को बचपन से गाने का शोख है और मैने उन्हें कई गुजराती प्रोग्राम में गाते हुए सुना है. उन्हें लोक संगीत से बहोत प्यार है. हेतल बहेन ने “अलबेला साजन आयोरी” सुनाया. हेतल बहेन भी यहाँ की मशहूर कलाकार है और उन्हें क्लासिकल गीत का ज्यादा शोख है.

क्या आप जानते है की १०० साल के हिंदी फिल्म के इतिहास में सिर्फ दो फिल्म में चारों मंगेशकर बहेनो ने साथ में गाया है? हेतल बहेन और आनल बहेन ने लताजी, आशाजी, और मीनाजी का गाया हुआ “काहे तरसाया जियरा” गाया और दिल जूम उठा. दिम्प्ल्भाई ने ऑडियंस रिक्वेस्ट को मानकर कई ग़ज़लों के दोहरे सुनाये. लेकिन हर रात का अंत तो होता ही है और ये गीत और ग़ज़ल की रात भी ख़त्म हुई, डिम्पल भाई के आखरी गाने के साथ “कल चौन्द्वी की रात थी” और होता रहेगा चर्चा इस रात का जिसकी दिल से प्रेक्षकों ने मजा ली.

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